श्रीनगर (गढ़वाल)।
होली जैसे पारंपरिक त्योहारों पर जहां घर-घर में पकवानों की खुशबू बिखरती है, वहीं श्रीनगर की महिलाओं ने इस परंपरा को आत्मनिर्भरता से जोड़ते हुए एक नई मिसाल कायम की है। पिछले आठ वर्षों से चार महिला समूह लगातार स्वरोजगार के माध्यम से पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन तैयार कर न केवल संस्कृति को संजोए हुए हैं, बल्कि आर्थिक मजबूती की दिशा में भी ठोस कदम बढ़ा रही हैं।
इन समूहों में आशा डोभाल, लक्ष्मी गुसाईं, कुसुम कंडारी, किरण कंडारी, सुनीता कठैत, कविता रमोला, रिंकी बंगवाल, आशा पोखरियाल और कुसुम बगवारी सहित कई महिलाएं मिलकर कार्य कर रही हैं। त्योहारों के दौरान ये महिलाएं गुजिया, मठरी, नमक पारे और रोट जैसे पारंपरिक व्यंजन तैयार करती हैं, जिन्हें स्थानीय बाजार में काफी सराहना मिल रही है।
हर साल दो लाख रुपये तक का कारोबार
महिला समूहों द्वारा हर वर्ष एक क्विंटल से अधिक उत्पादों की बिक्री की जाती है। पिछले वर्ष इन समूहों ने करीब दो लाख रुपये का कारोबार किया, जो उनकी मेहनत, गुणवत्ता और ग्राहकों के विश्वास को दर्शाता है।
उत्पाद और मूल्य सूची
गुजिया – 450 रुपये प्रति किलो
मठरी – 300 रुपये प्रति किलो
नमक पारे – 300 रुपये प्रति किलो
रोट – 350 रुपये प्रति किलो
महिलाओं का कहना है कि वे घरेलू जिम्मेदारियों के साथ समय निकालकर यह कार्य करती हैं। इससे जहां उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है, वहीं परिवार की आय में भी महत्वपूर्ण सहयोग हो रहा है।
त्योहारों के दौरान स्थानीय लोग भी इन उत्पादों को प्राथमिकता देकर महिला समूहों का उत्साह बढ़ा रहे हैं। यह पहल महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभर रही है।