श्रीनगर: डॉक्टरों के समर्पण ने यमराज के मुंह से छीनी नवजात की जिंदगी, मिला नया जीवन
- फेफड़े थे संक्रमित, थमी हुई थी धड़कन; बेस अस्पताल के बाल रोग विभाग का बड़ा चमत्कार।
- गर्भ में मीकोनियम निगलने से क्रिटिकल हो गई थी स्थिति, 2 हफ्ते तक चला मौत से संघर्ष।
- निजी अस्पताल में जिस इलाज के लगते 8 लाख, वह सरकारी अस्पताल में हुआ मुफ्त।
श्रीनगर (गढ़वाल)।
जिंदगी और मौत के बीच चल रही जंग में जब हर पल उम्मीद टूटती नजर आ रही थी, तब वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय मेडिकल कॉलेज के हेमवती नंदन बहुगुणा बेस अस्पताल के डॉक्टरों ने अपनी विशेषज्ञता, धैर्य और समर्पण से एक बड़ा चमत्कार कर दिखाया। बाल रोग विभाग की टीम ने यमराज के मुंह से एक नवजात शिशु को सुरक्षित बाहर निकालकर चिकित्सा सेवा की एक अनूठी मिसाल पेश की है।
गर्भ में ही क्रिटिकल हो गई थी स्थिति
रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि क्षेत्र (वीरों देवल गांव) निवासी सुबोध सिंह की पत्नी ऋतु को प्रसव पीड़ा होने पर बेस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच के दौरान गायनी विभाग की चिकित्सक डॉ. नेहा काकरान और उनकी टीम ने पाया कि शिशु ने गर्भ में ही मीकोनियम (पहला मल) निगल लिया है, जिससे स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने बिना समय गंवाए तत्काल ऑपरेशन (एलएससीएस) कर सुरक्षित प्रसव कराया।
जन्म के समय थमी थीं सांसें और धड़कन
असली चुनौती प्रसव के ठीक बाद शुरू हुई। जन्म के तुरंत बाद नवजात ने न तो रोना शुरू किया, न उसकी धड़कन चल रही थी और न ही वह सांस ले पा रहा था। ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम था और फेफड़े गंभीर रूप से संक्रमित हो चुके थे।
ऐसी नाजुक स्थिति में मौके पर मौजूद बाल रोग विशेषज्ञों ने तत्काल नवजात का रेससिटेशन (पुनर्जीवन प्रक्रिया) शुरू किया और उसे तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर लिया।
जीवनरक्षक दवा और वेंटिलेटर ने बचाई जान
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सी.एम. शर्मा और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंकिता गिरी की टीम ने गहन जांच के बाद शिशु को फेफड़ों के उपचार के लिए सर्फैक्टेंट नामक जीवनरक्षक दवा की दो खुराक दी। इसका सकारात्मक असर हुआ और धीरे-धीरे ऑक्सीजन का स्तर सुधरने लगा।
क्या थी सबसे बड़ी बीमारी?
डॉ. सी.एम. शर्मा ने बताया कि शिशु PPHN (पर्सिस्टेंट पल्मोनरी हाइपरटेंशन) जैसी गंभीर स्थिति से जूझ रहा था, जिसमें हृदय की रक्त वाहिकाओं में दबाव बढ़ जाता है। विशेष दवाओं और लगातार 4 दिनों तक वेंटिलेटर पर रखने के बाद नवजात को सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटाया गया।
2 सप्ताह का कड़ा संघर्ष, प्राइवेट में लगते 8 लाख रुपये
करीब दो सप्ताह तक एनआईसीयू (NICU) में चले गहन उपचार और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सतत निगरानी के बाद नन्हीं परी अब पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से सकुशल डिस्चार्ज कर दिया गया है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यही इलाज यदि किसी प्राइवेट अस्पताल में होता, तो परिवार को 5 से 8 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते, जो यहाँ बिल्कुल मुफ्त और विश्वस्तरीय स्तर पर हुआ।
इस टीम ने रचा इतिहास
इस जीवनरक्षक टीम में बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सी.एम. शर्मा, डॉ. अंकिता गिरी के साथ सीनियर रेजिडेंट डॉ. अजय, जूनियर रेजिडेंट डॉ. धीरज, डॉ. महेश, डॉ. अंजलि, डॉ. दानिश, डॉ. जाहिद एवं डॉ. आशीष शामिल रहे। डॉक्टरों के इस जज्बे को देखकर नवजात के परिजनों की आँखों में खुशी के आंसू हैं और वे पूरी टीम का आभार जता रहे हैं।