देहरादून
देहरादून: बुनियादी ढांचे (Infra) के निर्माण में गुणवत्ता और भ्रष्टाचार पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। देहरादून के प्रेमनगर स्थित नंदा की चौकी पर हाल ही में करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया नया पुल पहली ही तेज बारिश की मार भी नहीं झेल सका और धंस गया। पुल के एप्रोच मार्ग और संरचना में आई इस बड़ी खामी के बाद अब पूरे क्षेत्र के यातायात और पुराने राजमार्ग पर फिर से गहरे संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
पहली ही परीक्षा में फेल हुआ करोड़ों का प्रोजेक्ट
क्षेत्रवासियों को ट्रैफिक जाम से निजात दिलाने और आवागमन को सुगम बनाने के मकसद से इस पुल का निर्माण किया गया था। लेकिन मानसून की शुरुआती बारिश ने ही निर्माण एजेंसी के दावों और कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है।
- लागत: ₹16 करोड़ (अनुमानित)
- स्थिति: पुल के किनारे की एप्रोच रोड/दीवार का बड़ा हिस्सा धंसा
- प्रभाव: सुरक्षा कारणों से नए मार्ग पर आवाजाही जोखिम भरी, यातायात फिर से पुराने और जर्जर मार्ग की ओर डायवर्ट होने की नौबत।
पुराने राजमार्ग और स्थानीय निवासियों पर मंडराया संकट
नया पुल धंसने के कारण अब सारा दबाव एक बार फिर पुराने मार्ग पर आ गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भारी वाहनों की आवाजाही और पुराने पुल की सीमित क्षमता के कारण अब यहाँ घंटों लंबा जाम लग सकता है। साथ ही, अगर बारिश का दौर यूं ही जारी रहा, तो पुराने मार्ग को भी भारी नुकसान पहुँचने की आशंका बनी हुई है।
“16 करोड़ रुपये की जनता की गाढ़ी कमाई से बना पुल पहली ही बारिश में बहने की कगार पर पहुँच जाए, यह सीधी तौर पर घटिया निर्माण सामग्री और लापरवाही का मामला है। प्रशासन को तुरंत इस पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।”
— स्थानक निवासी एवं राहगीर
उठ रहे गंभीर सवाल:
- गुणवत्ता की जाँच कहाँ थी? पुल का उद्घाटन या हैंडओवर करने से पहले स्ट्रक्चरल सेफ्टी (Structural Safety) की सही तरीके से जाँच क्यों नहीं की गई?
- जवाबदेही किसकी? क्या संबंधित ठेकेदार और निगरानी करने वाले इंजीनियरों पर एफआईआर दर्ज होगी या केवल लीपापोती की जाएगी?
- सुरक्षा का ज़िम्मेदार कौन? यदि इस दौरान कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी होती?
फिलहाल, घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके का जायजा लिया है और एहतियात के तौर पर सुरक्षा घेरा बना दिया गया है। देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले में ठेकेदार पर क्या कार्रवाई करता है या इसे महज़ ‘प्राकृतिक आपदा’ का नाम देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
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