श्रीनगर गढ़वाल। पौराणिक एवं सांस्कृतिक नगरी श्रीनगर में ‘संस्कृत सप्ताह’ के उपलक्ष्य में एक भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया। इस दौरान पूरा नगर देववाणी संस्कृत के जयघोष, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक ढोल-दमाऊ की गूंज से भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा की महत्ता से परिचित कराना और लोक संस्कृति का संवर्धन करना रहा।
पारंपरिक परिधान और मनमोहक झांकियां
शोभायात्रा में क्षेत्र के विभिन्न संस्कृत विद्यालयों, डिग्री कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों, आचार्यों तथा स्थानीय नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
- वेशभूषा: छात्र पीतांबर वस्त्रों और छात्राएं पारंपरिक पहाड़ी परिधानों में सजी-धजी नजर आईं।
- झांकियां: प्राचीन ऋषि-मुनियों के आश्रम, वेद-पुराण ज्ञान परंपरा और उत्तराखंड की लोक संस्कृति पर आधारित जीवंत झांकियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
- जन-जागरण: हाथों में संस्कृत के श्लोक और भाषा संरक्षण से जुड़ी तख्तियां लेकर चल रहे युवाओं ने नगरवासियों को देववाणी अपनाने का संदेश दिया।
स्थान-स्थान पर पुष्पवर्षा से हुआ स्वागत
शोभायात्रा परिसर से प्रारंभ होकर मुख्य बाजार और शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरी। इस दौरान स्थानीय व्यापारियों और आम जनता ने जगह-जगह शोभायात्रा पर पुष्पवर्षा कर प्रतिभागियों का भव्य स्वागत किया। पूरे यात्रा मार्ग में श्लोकों के सुमधुर उच्चारण से माहौल अध्यात्म और ऊर्जा से भर गया।
सभ्यता और संस्कारों की जननी है संस्कृत
कार्यक्रम के समापन अवसर पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, ज्ञान-परंपरा और संस्कारों की आत्मा है। देवभूमि उत्तराखंड में इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजनों से नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत और जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है।
कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।