देहरादून | उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती और बागवानी को नया जीवन देने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। लंबे समय से प्रतीक्षित चकबंदी नीति (Land Consolidation) को अब धरातल पर उतारने की तैयारी पूरी हो चुकी है। पहले चरण में प्रदेश के 275 गांवों को इस नई नीति के दायरे में लाया जाएगा।बिखरी जोतों से मिलेगा छुटकारापहाड़ों में खेती की सबसे बड़ी चुनौती ज़मीन का छोटे-छोटे और दूर-दराज के टुकड़ों में बँटा होना है। इससे न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि जंगली जानवरों से फसल की सुरक्षा करना भी मुश्किल हो जाता है। नई चकबंदी नीति का मुख्य उद्देश्य इन बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर एकजुट करना है, ताकि किसान वैज्ञानिक ढंग से खेती और बड़े स्तर पर बागवानी कर सकें।नई नीति की मुख्य विशेषताएंसरकार ने इस बार की नीति को व्यावहारिक बनाने के लिए कई अहम बदलाव किए हैं:चयनित 275 गांव: पहले चरण में उन गांवों को प्राथमिकता दी गई है जहाँ चकबंदी के लिए ग्रामीणों की सहमति अधिक है।डिजिटल मैपिंग: ज़मीनों के सीमांकन के लिए आधुनिक तकनीकों और ड्रोन सर्वे का सहारा लिया जाएगा ताकि विवादों की गुंजाइश कम रहे।पलायन पर लगाम: ज़मीन एकजुट होने से बड़े बागान विकसित होंगे, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे और पलायन में कमी आएगी।सरकारी सहायता: चकबंदी वाले क्षेत्रों में सिंचाई, सड़क और बाड़बंदी (Fencing) के लिए सरकार विशेष क्लस्टर योजनाएं चलाएगी।कृषि और स्वरोजगार को मिलेगा बढ़ावाजानकारों का मानना है कि चकबंदी लागू होने से उत्तराखंड के सेब, कीवी और अन्य नकदी फसलों के उत्पादन में भारी उछाल आ सकता है। जब ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा एक जगह उपलब्ध होगा, तो मशीनीकरण (Mechanization) आसान हो जाएगा, जिससे खेती की लागत में कमी आएगी।”यह केवल ज़मीन का एकत्रीकरण नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों में आर्थिक क्रांति की शुरुआत है। 275 गांवों का यह मॉडल भविष्य में पूरे प्रदेश के लिए नज़ीर बनेगा।”आगे की राहप्रशासनिक स्तर पर इन 275 गांवों में चकबंदी अधिकारियों की तैनाती और राजस्व अभिलेखों के सुधार का काम युद्ध स्तर पर शुरू करने के निर्देश दे दिए गए हैं। ग्रामीणों को इस नीति के लाभ समझाने के लिए जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जाएंगे।