हिमालयी महाकुंभ: दुर्गम पहाड़ों पर उमड़ा आस्था का समंदर, माँ नंदा की पावन जात यात्रा में दिखे अलौकिक दृश्य
देहरादून/चमोली: ऊंचे-ऊंचे हिमशिखरों की ओट से छनकर आती धूप, ढोल-दमाऊ की थाप और ‘जय माँ नंदा’ के गगनभेदी जयकारों से गूंजती देवभूमि उत्तराखंड की घाटियां। ‘हिमालय का महाकुंभ’ कही जाने वाली माँ नंदा राजजात यात्रा के दौरान इन दिनों ऐसा ही भक्तिमय और अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है। माँ नंदा की पावन डोली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हजारों श्रद्धालुओं का रेला यह बयां कर रहा है कि जहाँ अटूट आस्था हो, वहाँ दुर्गम से दुर्गम रास्ते भी सुगम बन जाते हैं।
दुर्गम पथ और मौसम की चुनौती, लेकिन अडिग श्रद्धालुओं के कदम

समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित संकरे और पथरीले रास्तों पर सफर आसान नहीं है। कभी कड़ाके की ठंड तो कभी पल-पल बदलते पहाड़ी मौसम के बीच श्रद्धालु नंगे पांव और कंधों पर झोली टांगे आगे बढ़ रहे हैं। रास्ते भले ही थका देने वाले हों, लेकिन माँ नंदा की डोली की एक झलक पाते ही हर यात्री का उत्साह दोगुना हो जाता है। उच्च हिमालयी बुग्यालों (घास के मैदानों) से होकर गुजरती यह यात्रा दूर से किसी दिव्य रेखा जैसी प्रतीत होती है।
ढोल-दमाऊ की थाप और शंखध्वनि से गुंजायमान घाटियाँ

यात्रा मार्ग पर उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति का अभूतपूर्व संगम देखने को मिल रहा है। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे ग्रामीण, हाथों में माँ नंदा के पवित्र प्रतीक ‘छंतोली’ लिए आगे बढ़ रहे हैं। ढोल-दमाऊ, भांकोरा और कसार की पारंपरिक धुनों के बीच यात्रा के हर पड़ाव पर पुष्पवर्षा की जा रही है। जब माँ नंदा की डोली किसी गाँव में पहुँचती है, तो पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में रंग जाता है।
बेटी की विदाई का भावुक पल
उत्तराखंड की लोक परंपरा में माँ नंदा को केवल देवी ही नहीं, बल्कि अपने ही घर की बेटी (ध्याणिन) माना जाता है। यह पावन जात यात्रा माँ नंदा की अपने मायके (मैत) से कैलाश (पति के घर) लौटने का प्रतीक है। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर श्रद्धा और वात्सल्य का अनोखा संगम दिखाई देता है। महिलाओं की आँखों में बेटी की विदाई के भावुक आँसू हैं, तो वहीं दिलों में माँ का आशीर्वाद पाने की असीम खुशी।
चौसिंग्या खाडू और छंतोली बनीं आकर्षण का केंद्र
यात्रा की अगुवाई कर रहा चार सींगों वाला दिव्य ‘चौसिंग्या खाडू’ और उसके पीछे चलती सुसज्जित छत्रियाँ श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। बिना किसी राहगीर के भटके, चौसिंग्या खाडू का तय पड़ावों पर खुद-ब-खुद आगे बढ़ना और श्रद्धालुओं का अनुशासित ढंग से उसके पीछे चलना, इस यात्रा के अलौकिक और रहस्यमयी स्वरूप को उजागर करता है।
दुर्गम पर्वतमालाओं के बीच बहती भक्ति की यह अविरल धारा न केवल देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करती है, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच के गूढ़ आध्यात्मिक संबंध को भी प्रगाढ़ करती है। माँ नंदा की डोली के साथ चलता यह कारवां महज एक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और लोक-परंपरा की एक अनूठी गाथा है जो हर देखने वाले के हृदय में अमिट छाप छोड़ जाती है।