नैनीताल:बढ़ते प्रदूषण और ईंधन की खपत को कम करने की दिशा में उत्तराखंड न्यायपालिका ने एक बेहद सराहनीय और प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने अपनी सरकारी गाड़ियों को छोड़कर पैदल ही अदालत परिसर का रुख किया। इस अनोखे कदम के साथ ही पूरे राज्य में ईंधन बचाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष अभियान का आगाज हो गया है।क्या है पूरा मामला?आमतौर पर वीआईपी सुरक्षा और सरकारी गाड़ियों के काफिले से घिरे रहने वाले हाई कोर्ट के जज जब आज सुबह नैनीताल की सड़कों पर पैदल चलते नजर आए, तो हर कोई हैरान रह गया। जजों का यह कदम किसी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से खत्म हो रहे जीवाश्म ईंधन (Fuel) के प्रति लोगों को जागरूक करने की एक मुहिम है।इस अभियान के तहत यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि अगर समाज का शीर्ष तबका अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर पर्यावरण के लिए कदम उठा सकता है, तो आम जनता भी छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा बदलाव ला सकती है।अभियान के मुख्य बिंदु:’नो व्हीकल’ पहल की शुरुआत: कोर्ट परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में ईंधन जनित वाहनों के उपयोग को कम करने का आह्वान।सेहत और पर्यावरण का तालमेल: पैदल चलने से न सिर्फ ईंधन की बचत होगी, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिहाज से भी एक बेहतरीन संदेश है।आम जनता से अपील: न्यायपालिका ने राज्य के नागरिकों, विशेषकर युवाओं से अपील की है कि वे कम दूरी तय करने के लिए वाहनों की जगह पैदल चलने या साइकिल का उपयोग करने की आदत डालें।सोशल मीडिया और जनता में भारी सराहनाजैसे ही जजों के पैदल मार्च और इस खास अभियान की खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर इसकी जमकर तारीफ होने लगी। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य के लिए, जहां इको-सिस्टम बेहद नाजुक है, ऐसे अभियान मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।विशेषज्ञों की राय:”न्यायपालिका द्वारा उठाया गया यह कदम सिर्फ एक दिन की प्रतीकात्मक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह समाज के मानस को बदलने की एक गंभीर कोशिश है। जब न्याय के शीर्ष पदों पर बैठे लोग जमीन पर उतरते हैं, तो नियम और संदेश सीधे जनता के दिलों तक पहुंचते हैं।”उत्तराखंड हाई कोर्ट से शुरू हुआ यह ‘फ्यूल सेविंग कैंपेन’ आने वाले दिनों में राज्य के अन्य सरकारी विभागों और जिलों में किस तरह लागू किया जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन फिलहाल, माननीय जजों ने पैदल चलकर बदलाव की एक नई राह जरूर दिखा दी है।