‘गोपेश्वर (चमोली): एक ओर सरकारें ‘विकसित उत्तराखंड’ और सुदूर गांवों तक सड़क पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर चमोली जिले से आई एक तस्वीर इन दावों की पोल खोल रही है। चमोली के दशोली विकासखंड में सड़क सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को एक गंभीर रूप से घायल महिला को जान जोखिम में डालकर 8 किलोमीटर तक डंडी-कंडी (पालकी) के सहारे पैदल सड़क तक पहुंचाना पड़ा।जंगल में चारा पत्ती लेते समय हुआ हादसाप्राप्त जानकारी के अनुसार, शुक्रवार सुबह दशोली विकासखंड स्थित निजमुला घाटी के मौली हडूंगा गाँव निवासी गुड्डी देवी (पत्नी वीरेंद्र सिंह) रोजमर्रा की तरह जंगल में चारा-पत्ती लेने गई थीं। इसी दौरान पेड़ से अनियंत्रित होकर गिरने के कारण वह गंभीर रूप से घायल हो गईं।पहाड़ी रास्तों पर 8 किमी का संघर्षमहिला की हालत गंभीर थी और उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाना जरूरी था, लेकिन गाँव तक सड़क न होने के कारण यह एक बड़ी चुनौती बन गई। ऐसे में ग्रामीणों ने मानवीय संवेदनशीलता और एकता का परिचय दिया। उन्होंने आनन-फानन में लकड़ी और कपड़ों से एक देशी डोली (डंडी-कंडी) तैयार की।घायल गुड्डी देवी को डोली में लिटाकर ग्रामीण ऊबड़-खाबड़ और पथरीले पहाड़ी रास्तों से लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचे। यह सफर बेहद थका देने वाला और जोखिम भरा था।जिला अस्पताल गोपेश्वर में उपचार जारीमुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद ग्रामीणों ने 108 एम्बुलेंस सेवा को सूचना दी। एम्बुलेंस की मदद से घायल महिला को जिला अस्पताल गोपेश्वर ले जाया गया, जहां उन्हें भर्ती कराया गया है और उनका उपचार जारी है।प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवालयह घटना उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और सड़क कनेक्टिविटी की जमीनी हकीकत को उजागर करती है।क्या आज भी पहाड़ के सीमांत गांवों के लिए ‘विकास’ सिर्फ कागजों तक सीमित है?आजादी के अमृत काल में भी गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बीमारों को अस्पताल तक पहुँचाने के लिए डंडी-कंडी ही एकमात्र सहारा क्यों है?चमोली की यह तस्वीर शासन-प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है कि जब तक बुनियादी ढांचा दुरुस्त नहीं होता, तब तक ‘विकसित उत्तराखंड’ का सपना अधूरा ही रहेगा।